ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा का कर्ज संकट गिरवी रखे शेयरों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में हुए घाटे और व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ी देनदारियों के कारण लगातार गहराता गया। लेनदारों के लगभग 22,006 करोड़ रुपये के दावों के बीच नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी NCLT ने 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान और 25 लाख रुपये की प्रक्रिया फीस पर उन्हें देनदारियों से मुक्त करने का आदेश दिया था। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद NCLT की नई पीठ ने पुराने आदेश पर रोक लगाते हुए संपत्तियों के हस्तांतरण पर भी पाबंदी लगा दी।
ज़ी के शेयर गिरवी रखकर जुटाई गई पूंजी
सुभाष चंद्रा ने 1990 के दशक में निजी सैटेलाइट चैनल ज़ी टीवी की शुरुआत की थी। बाद में समूह ने मीडिया से बाहर पूंजी की अधिक जरूरत वाले क्षेत्रों में भी कारोबार बढ़ाया। इन परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से ज़ी एंटरटेनमेंट यानी ZEEL में प्रमोटर हिस्सेदारी और शेयरों को गिरवी रखा गया। शेयर बाजार में ज़ी का प्रदर्शन मजबूत रहने तक यह व्यवस्था चलती रही, लेकिन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में देरी और घाटा बढ़ने से समूह का वित्तीय संतुलन बिगड़ गया।
वर्ष 2019 की शुरुआत में सामने आया कि समूह पर करीब 45,000 करोड़ रुपये का कर्ज था। जनवरी 2019 में एक संदिग्ध कंपनी से समूह के जुड़ाव की खबरों के बाद उसकी कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट आई। ZEEL का शेयर 26 प्रतिशत से अधिक टूट गया, जबकि डिश टीवी के शेयर में करीब 33 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। इससे गिरवी रखे शेयरों का मूल्य भी तेजी से घट गया।
शेयरों का मूल्य कम होने पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने अतिरिक्त रकम या संपत्तियों की मांग की। गिरवी का जरूरी अनुपात कायम नहीं रहने पर लेनदारों ने शेयर बेचकर वसूली शुरू की। इस बिकवाली से शेयरों पर दबाव और बढ़ा तथा उनकी कीमतें नीचे जाती रहीं। नतीजतन, गिरवी शेयरों पर लिए गए कर्ज और बाजार में गिरती कीमतों का संकट एक-दूसरे को बढ़ाता चला गया।
पर्सनल गारंटी ने बढ़ाया व्यक्तिगत जोखिम
सुभाष चंद्रा के लिए सबसे बड़ा जोखिम उनकी ओर से दी गई पर्सनल गारंटी बनी। सामान्य स्थिति में किसी कंपनी का कर्ज उसकी संपत्तियों तक सीमित रहता है, लेकिन व्यक्तिगत गारंटी देने पर कंपनी के भुगतान में विफल रहने की स्थिति में गारंटर की निजी संपत्ति और आर्थिक हैसियत भी दायरे में आ जाती है। उनकी बुनियादी ढांचा कंपनियों को कर्ज दिलाने के लिए दी गई ऐसी गारंटियों के कारण कंपनियों की देनदारियां उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़ गईं।
कंपनियों के डिफॉल्ट के बाद लेनदारों ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की। चंद्रा का कहना है कि उनका अपना कर्ज करीब चार हजार करोड़ रुपये था, जबकि बाकी मामले व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े थे। संकट कम करने के लिए सोलर पावर प्लांट, हाईवे परियोजनाएं और अन्य संपत्तियां बेची गईं। ज़ी एंटरटेनमेंट में बड़ी हिस्सेदारी बेचने के बाद कंपनी पर उनका नियंत्रण भी समाप्त हो गया।
सुभाष चंद्रा का दावा है कि उन्होंने और उनके समूह ने संपत्तियां बेचकर मूल 45,000 करोड़ रुपये में से लगभग 43,000 करोड़ रुपये लेनदारों को लौटा दिए। इसके बावजूद पर्सनल गारंटी से जुड़ी देनदारियां बनी रहीं। वर्ष 2022 में इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने उनकी व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर व्यक्तिगत दिवालियापन की अदालती प्रक्रिया शुरू की।
NCLT के आदेश में मिली राहत
NCLT के सामने लेनदारों ने करीब 22,006 करोड़ रुपये का दावा किया था, जिसमें सुभाष चंद्रा की पर्सनल गारंटी से जुड़ी देनदारियां शामिल थीं। ट्रिब्यूनल ने उनकी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति के आधार पर 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान और 25 लाख रुपये की अतिरिक्त प्रक्रिया फीस के साथ देनदारियों से मुक्ति देने का आदेश दिया। इस व्यवस्था को करीब 99.97 प्रतिशत कर्जमाफी के रूप में देखा गया और इसके बाद लेनदारों की वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठे।
लेनदारों की वोटिंग पर क्यों उठा विवाद
कॉर्पोरेट कर्ज प्रक्रिया में लेनदारों का मतदान अधिकार उनके दावे के आकार के आधार पर तय होता है। इस मामले में 23 लेनदारों की सूची में HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, IDBI बैंक, LIC हाउसिंग फाइनेंस और यूनियन बैंक जैसी संस्थाएं शामिल थीं। इन बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने प्रस्ताव का विरोध किया, लेकिन मतदान में उनकी संयुक्त हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत ही थी। LIC हाउसिंग फाइनेंस के पास इनमें सबसे अधिक छह प्रतिशत मतदान अधिकार था।
दूसरी ओर, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर के पास 28.49 प्रतिशत, लेमोनेड कैपिटल एडवाइजर्स के पास 16.85 प्रतिशत, कैटेलिस्ट ट्रस्टीशिप के पास 11.85 प्रतिशत और कॉर्पकॉल एडवाइजर्स के पास 10.30 प्रतिशत मतदान अधिकार था। इन इकाइयों ने सुभाष चंद्रा की इनसॉल्वेंसी योजना के पक्ष में मतदान किया। अधिक मतदान हिस्सेदारी के कारण उनका समर्थन बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के विरोध पर भारी पड़ा, जिससे पूरी प्रक्रिया विवादों में आ गई।
नई पीठ ने पुराने आदेश पर लगाई रोक
बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने NCLT के आदेश को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी NCLAT में चुनौती देने की प्रक्रिया शुरू की। उनका तर्क है कि इतनी बड़ी राहत मिलने से व्यक्तिगत गारंटी की प्रभावशीलता पर असर पड़ेगा। इस बीच विवाद को देखते हुए NCLT ने पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया। मंगलवार को नई पीठ ने पिछले आदेश पर रोक लगा दी और सुभाष चंद्रा को निर्देश दिया कि गारंटर के तौर पर वे अपनी संपत्तियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित न करें।
इस तरह सुभाष चंद्रा को मिली राहत फिलहाल कानूनी विवाद में फंसी हुई है। ज़ी एंटरटेनमेंट पर उनका नियंत्रण पहले ही समाप्त हो चुका है, जबकि पर्सनल गारंटी से जुड़ी देनदारियों और लेनदारों की वोटिंग पर अंतिम स्थिति आगे की अदालती कार्यवाही से तय होगी।