हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि से जुड़े मामले में कहा है कि संधि पूरी तरह प्रभावी है और भारत को इसका पालन करना चाहिए। भारत ने इस फैसले को खारिज करते हुए मध्यस्थता न्यायाधिकरण के गठन और उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए हैं।
भारत ने फैसले पर क्या कहा
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस मध्यस्थता न्यायाधिकरण का गठन विश्व बैंक ने सिंधु जल संधि की शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया था। मंत्रालय ने कहा, “आज गैर-कानूनी ढंग से गठित तथाकथित ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ ने सिंधु जल संधि के तहत अंतरिम उपायों और स्थिति से संबंधित एक फैसला जारी किया है।” भारत ने कहा कि वह इस फैसले को उसी तरह खारिज करता है, जैसे इस संस्था के पिछले फैसलों को करता आया है।
भारत का कहना है कि इस न्यायाधिकरण को उसके संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का अधिकार नहीं है। नई दिल्ली के मुताबिक, जब न्यायाधिकरण का गठन ही संधि की शर्तों के अनुरूप नहीं हुआ तो उसके फैसले का कोई महत्व नहीं रह जाता।
परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन क्या है
परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन यानी PCA नीदरलैंड्स के हेग में स्थित एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसकी स्थापना 1899 और 1907 के हेग कन्वेंशन फॉर द पैसिफिक सेटलमेंट ऑफ इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स के तहत हुई थी। नाम में ‘कोर्ट’ होने के बावजूद इसमें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जैसी स्थायी पीठ नहीं होती। यह मध्यस्थता के लिए प्रशासनिक, कानूनी और रजिस्ट्री सहायता उपलब्ध कराता है।
किसी विवाद को PCA के समक्ष लाने के लिए संबंधित पक्षों की सहमति जरूरी होती है। प्रत्येक मामले के लिए अलग अस्थायी न्यायाधिकरण गठित किया जाता है। PCA का इंटरनेशनल ब्यूरो रजिस्ट्री और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाएं संभालता है। विवाद से जुड़े पक्ष सूचीबद्ध व्यक्तियों या बाहर से मध्यस्थ चुन सकते हैं। जरूरत पड़ने पर PCA के सेक्रेटरी-जनरल नियुक्ति प्राधिकारी की भूमिका निभाते हैं।
फैसले लागू कराने की व्यवस्था
PCA के फैसलों की बाध्यता संबंधित पक्षों की सहमति पर निर्भर करती है। संस्था के पास फैसले लागू कराने के लिए अपना कोई पुलिस, सैन्य या अन्य प्रत्यक्ष प्रवर्तन तंत्र नहीं है। कोई पक्ष फैसला स्वीकार नहीं करता है तो दूसरा पक्ष घरेलू अदालतों या द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से उसे लागू कराने का प्रयास कर सकता है।
सिंधु जल संधि को लेकर विवाद
सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस संधि को स्थगित कर दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने हेग स्थित मध्यस्थता व्यवस्था का रुख किया। न्यायाधिकरण ने भारत के खिलाफ फैसला सुनाया, जबकि नई दिल्ली ने उसके गठन को ही संधि की शर्तों के विपरीत बताते हुए निर्णय मानने से इनकार कर दिया। भारत ने इस मामले में राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की बात कही है।

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